Friday, 27 December 2019

हरियल

ગુજરાતી સંસ્કરણ: https://ekakinchan.blogspot.com/2019/12/blog-post.html
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१.
दिसंबर आधे से ज्यादा बीत चुका था पर अभी शीतलहर जैसे हालत नहीं थे। हाँ धूप सेकने में आनंद आये उतनी ठंड तो थी ही. मैं हर दिन की भांति गंगा किनारे की मेरी मनपसंद जगह पर प्रवासी पक्षी दिख जाये उस आशा में खडी थी। उतने में कुछ दूर हलकी सी हलचल लगी तो मैंने कैमरा उस तरफ किया। देखा तो एक छोटा गिरगिट १५-२० फुट दूर पेड पर पत्तों के पीछे से मेरी तरफ देख रहा था. ये सोच कर की वो मुझसे डर रहा है, मैं थोड़ा पीछे हटने ही वाली थी के वो छिपने के बदले पूरा बहार आ कर धूप सेंकने लगा। मैंने भी पीछे हटने के बजाय उसका फोटो ले लिया और वो भी और पास जा कर।

लेकिन जिस तरह से मेरे वहां होने से डरा नहीं बल्कि मुझे तो वो उपर से आश्वस्त लगा, वो कुछ मेरी समझ में नहीं आया. पहले तो कभी कोई गिरगिट ने मेरा खास स्वागत नहीं किया था। पर जैसे ही मैं वहां से जाने लगी तो उसी पेड पर बैठा हुआ एक कौवा दिखा। अब समझ में आया की गिरगिट मुझे ढाल बना कर धूप सेंक रहा था।

ऐसा ही कुछ थोड़े दिन पहले भी हुआ था जब एक छोटी गिलहरी ने गुलाबी मैना के समूह ने मुझसे दूरी बनायीं रखी थी उसका उपयोग करते हुए मेरे पास के फुलों से अपनी पेट पूजा कर ली थी।
यहाँ मैं इस बात पर जोर देना नहीं चाह रही हूँ की हमारे आसपास के पशु पक्षी हमारा उपयोग कैसे करते है, वह तो एक सामान्य बात है (जैसे मेरे बहुत से पक्षी मित्रों ने मुझे उन्हें खाना देना, पानी रखना तथा उसकी सुरक्षा करना ऐसे काम दे रखे है), पर यहाँ तो ऐसे लोग जिनसे मेरी जान पहचान बिलकुल नहीं है तथा वो मनुष्य से व्यवहार करने के अभ्यस्त भी नहीं है, तदुपरांत भी उन्होंने presence of mind दिखाते हुए कैसे वर्तमान परिस्थिति में अपने लिए जो श्रेष्ठ था वो कैसे चुना।

पूरी तरह से अनजान तथा आकस्मिक आन पड़ी परिस्थिति में दो एक दूसरे से अपरिचित व्यक्तियों ने कैसे संवाद स्थापित किया उस बारे में एक बात याद आ रही है। जो अगली कडी में.
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२.

लगभग ग्यारह बजे थे। बाहर कुछ गडबड लगी, थोडी देर तो ध्यान नहीं दिया पर फिर जा के देखा तो एक शिकरा बाज जमीन पर एक बडे से पिले फल को पकडे बैठा था। उतना तो समझ में आया के दृष्टि भ्रम है इसलिए ठीक से देखने के लिए में उसकी तरफ बढी। शिकरा मुझे आती देख उड गया और वो बडा पीला फल एक हरियल (yellow footed green pigeon) था।

मेरे एकदम पास जाने पर भी वो बिलकुल नहीं हिला और मेरे उसको उठा कर अंदर लाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं की. पूरी रात चली बारिश से वो पानी में भिगोये हुए स्पॉन्ज की तरह भीगा हुआ था। थोडा घायल था पर ऐसे ठीक ठाक लग रहा था। पर डरा हुआ बहुत ज्यादा था। 

थोडी देर उसको अकेला छोडना ही अच्छा होगा यह सोच कर मैंने उसके सामने पानी, मुरमुरे (लाई) रखे, उसको साफ किया, घाव पर हल्दी डाली और दूर चली आयी। मुरमुरे देने के पीछे मेरा आशय उसको तुरंत कुछ खिलाने से ज्यादा मित्रता का हाथ बढाना था। वो तो लेकिन अपना मुंह दीवार की तरफ करके आँख बंध करके बैठ गया न उसने खाने की तरफ कोई ध्यान दिया, न मेरे मित्रता के प्रस्ताव पर। एक दो बार मैंने दूर से ही उससे बात करने का प्रयत्न किया तो वो अपने शरीर को दीवार के और पास धकेलने लगा।   

ऐसे ही तीन घंटे निकल गए। वो अभी भी डरा हुआ सा दीवार की तरफ मुंह करके सो रहा था। हालांकि अब वो मेरे उससे बात करने को स्वाभाविकता से ले रहा था भले ही प्रतिक्रिया कुछ भी न दी हो। देर से ही सही मुझ में अक्ल का संचार हुआ। गूगल किया के हरियल खाते क्या है। देखा तो वो तो फल खाते है। तो अब मैंने उसके सामने संतरे की चिर रखी। बंध दिख रही आँखों के किनारे से उसने संतरे की तरफ देखा। और अचानक ही उसके हावभाव पूरे बदल गये। उसने संतरे की तरफ देखा फिर मेरी तरफ फिर संतरे की तरफ और अब उसकी आंखें पूरी खुली थी डर उसमें कहीं नहीं था बल्कि अब वो विश्वास और आशा से भरी हुई थी। उसकी गरदन जो अब तक कंधों के बीच में धसी हुई थी अब ऊंची थी तथा और ६० seconds बाद वो दीवार नहीं मेरी तरफ मुंह करके बैठा था। खाने में अभी भी उसने कोई रुचि नहीं दिखायी।

कुछ देर बाद उसने उडने का प्रयास किया। लेकिन छोटी सी बंध जगह जिसको हम मनुष्य घर कहते है वो उसे बिलकुल समझ नहीं आयी और वो यहां वहां ठुक के अंत में कुछ ४ फीट की ऊंचाई पर एक पाइप पकड के बैठ गया। इससे वो फिर से खूब डर गया और अपनी लाक्षणिक दीवार में मुँह वाली मुद्रा धारण करके बैठ गया। वो भले ही निराश हुआ पर मैं इस प्रकरण से आशान्वित हो गयी। उसके न मात्र पैर, आंखें और सामान्य स्वास्थ्य ठीक ठाक था, उसके पंख भी ठीक थे। और जहां तक उसमें पुनः विश्वास जगाने की बात थी, मुझे विश्वास था के जो एक बार हुआ था तो फिर से भी होगा। में उसको अमरूद देती हूँ, कोई प्रतिक्रिया नहीं। संतरा, नहीं। केला, नहीं। पानी, नहीं। वो जैसे पत्थर की मूरत बन गया था। 

उत्साह लेकिन बहुत उपयोगी वस्तु है। मुझे पता था क्या करना है। मैं उसके पास की खिडकी खोलती हूँ। वहां मच्छरजाली लगी हुई है इसीलिए हरियल को बहार से कोई भय नहीं है। मै रोटी के छोटे छोटे टुकड़े करके मेरे babbler (सात भाई) मित्रों को बुलाती हूँ। वो तुरंत ही आते है और खूब जोर जोर से चिल्लाते हुए आनंद के साथ रोटी पर टूट पडते है। हरियल के पास इनके आनंद से अछूता रहने का विकल्प ही नहीं है। वो पुनः मेरी तरफ मुंह करके बैठता है और मुझे पता है के अब वो कभी भी दीवार की और नहीं मुडेगा। 

इसके पश्चात निचे की अंतहीन पुनरावृत्ति प्रारम्भ होती है। 
मैं उसके पास हर एक फल और पानी बारी बारी ले कर जाती हूँ। वो किसी वस्तु में रुचि नहीं दिखता। मैं फिर भी उसको खाने का आग्रह करती हूँ। वो अपना सर बाये दायें बाये दायें धीरे तथा उसके पश्चात द्रुत गति से घुमाता है। अपनी चोंच खोल बंध करके जैसे मुझे चले जाने के लिए भी कहता है। मैं तथापि डटी रेहती हूँ। मुझसे बात करने का कोई अर्थ नहीं है यह सोच कर वो अपनी गरदन पूरी घुमाकर मुंह अपनी पीठ में डालकर सो जाता है। मैं हार स्वीकार करती हूँ अगले १-२ घंटों के लिये। जिसके बाद इस पूरी प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। 

दूसरे दिन की सुबह। मैं उसे आगे वाले रूम में ले जाने का तय करती हूँ। वो लेकिन इस बात पर तैयार नहीं होता के मैं उसे पकडूं। मैं उसे अपने हाथ पे बैठने को कहती हूँ जो उसको ठीक लगता है। मनुष्य के हाथ पर सवारी करता हुआ जब वो घर को प्रवासी कुतूहलता से देखता हुआ जाता है तो वो क्या सोचता होगा। की ये भूमिबद्ध प्राणी विचित्र है तथा मूर्ख भी पर कदाचित जितने कुख्यात है उतने भी बुरे नहीं है?

खैर हम आगे वाले कमरे में पहुँच जाते है। मेरी इच्छा है की वो खिड़की के पास वाली मेज पर बैठे। पर महाशय की इच्छा मेरी इच्छा से मेल नहीं खाती। अब उसे मेरे हाथ से उतरना नहीं था। जैसे जैसे मैंने उसे हाथ से उतरने की प्रेरणा दी ऐसे ऐसे मेरे हाथ पर उलटी और चढता गया और अपने शरीर को मेरे हाथ से दृढता से चिपका रखा। जैसे तैसे मैंने उसे मेज पर बिठाया। आगे का दरवाजा खोल कर फिर babblers को बुलाये। वो घर के अंदर आते है, मेज के आस पास हो हल्ला करते है थोडी देर सोचते है की हरियल के फल को भी अपना ही समझे या नहीं पर फिर ऐसा न करते हुए चले जाते है। दरवाजा खुला है हरियल को जाना हो तो वो जा सकता है पर उसकी ऐसी कोई इच्छा नहीं है। वो तो बस शांति से खिडकी के बाहर देखता रहता है। 

उसको आ कर २२ घंटे हो चुके है पर अभी तक उसने कुछ भी खाया पिया नहीं है। वो अगर शक्ति खाने के पाचन में न लगाकर स्वाथ्यलाभ में लगाना चाहता है तो ऐसा ही सही पर एक बूंद पानी भी नहीं? मुझे अब थोडी चिंता होने लगी है। हाँ यह तो है के पिछले २२ घंटों में वो उत्तरोत्तर ज्यादा स्वस्थ लग रहा है। मैं बहार जा के हरियल के मनपसंद दो अलग अलग पेड के बढिया से पके हुए फल ले आती हूँ। वो उसको भी नहीं देखता। बस शांति से बैठा खिडकी के बाहर देखता रहता है।

लगभग उसी समय जब कल उसको शिकरा ने पकडा था वो अचानक अशांत हो उठा। उसे बाहर जाना है। अभी के अभी। वो खिडकी से बाहर जाने का प्रयत्न करता है पर वहां मच्छरजाली लगी है। दीवार छत से टकरा कर प्रवेशद्वार के ऊपर परदे के रॉड पे जा बैठता है। मैं दौड कर दरवाजा खोलती हूँ। वो बाहर नहीं जाता। मैं मेरा हाथ ऊपर करके उसको आने को कहती हूँ, वो हाथ पर आ जाता है। मैं हाथ निचे लाती हूँ और वो खुले दरवाजे के सामने है।  वो अभी भी नहीं उड जाता है। मैं आगे बढती हूँ और अब हम खुले आकाश के निचे है। मैं उसे कहती हूँ की उसको अपनी दुनिया में लौटते हुए देख मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी पर अभी जाना है या नहीं उसका निर्णय उसे ही करना है। यदि वो अभी पूरा आश्वस्त नहीं है तो जितना चाहे उतना यहाँ रह सकता है। अभी के अभी जाना अनिवार्य नहीं है।

वो मेरी बात सुनता है फिर ऊपर देखता है। एक एक करके आस पास के सारे वृक्ष का निरीक्षण करता है फिर मेरी तरफ एक लंबे बिना कोई जल्दी वाले पल तक देखता है और अब उसके पैरो ने मेरा हाथ नहीं पकडा उसका भार अब उसके पंखों ने उठाया है। उसी नीम के पेड पर जा कर बैठता है जहां से कल गिरा था।

इससे आगे कहानी कहना सरल नहीं है। उसको अपनी दुनिया में लौटते देखने का आनंद और वो तीव्र संवेदना जो अचानक हुए ये ज्ञान से उत्पन्न होती है के अब तक आपका सम्पूर्ण चित्त जिस वस्तु में लगा था वो अपनी दुनिया में लौट चूका है दोनों साथ साथ कह पाना असम्भव सा है। 

थोडे प्रयत्न के बाद हरे पिले रंग के पत्तों के बीच में बैठे हुए वही रंगो वाले उसको मैंने ढूंढ निकाला। और अचानक याद आया - फोटो? मैं दौड कर कैमरा लाती हूँ और फोटो लेती हूँ। 

फोटो में एक बात पर ध्यान जाता है जो अब तक नहीं देखा था. उसके लम्बे लम्बे नाखून। उसी के साथ एक और वस्तु का भी भान होता है - मेरे हाथ पे तीन तीन इंच लम्बे लाल और सूजे हुए निशान। उसकी हाथ पर से निचे न उतरने की हठ के समय हुए होंगे।

वो पेड पे अकेला बैठा है। मैं अकेली निचे खडी हूँ। ५ -१० मिनिट के बाद वो फिर उडान भरता है। वो मेरे सर के उपरसे पसार होता है। क्या वो ठीक से उड रहा है - मैं नर्वसनेस के साथ देखती हूँ। और ये क्या, वो आगे वाले गुलमोहर पर नहीं रुकता, और ऊंचाई पर जाता है और दूर वाले एक ऊँचे बिना पत्तों के पेड पर जाकर बैठता है। एक पल तो मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता। उस पेड पे हरियल का एक झुंड पहले से ही बैठा है। वो अब न तो निर्बल था न ही अकेला।

दूर से उस पेड पर बैठा हुआ मेरा हरियल एक छोटे से बिंदु से ज्यादा नहीं लग रहा था। फिर भी, एक अंतिम बार मैं कैमरा उसकी तरफ करती हूँ। एक ऐसा फोटो जिसमें मुझे यह पता हो के ये बिंदु मेरा हरियल है वह भी मेरे लिये अमूल्य होता पर जब मैं फोटो लेती हूँ तो वो ऐसा आता है। सारे पक्षी मेरी तरफ पीठ और सामने की तरफ मुँह हो ऐसे बैठे है पर मेरा हरियल मुडकर पीछे मेरी ओर देख रहा है। 

वो कहीं उतनी दूर से भी देख न ले उस डर से आँसू को रोकते हुए मैंने कहने का प्रयत्न किया, मेरी चिंता मत करना, तुम खुशी खुशी जाओ।

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