Friday, 27 December 2019

हरियल

ગુજરાતી સંસ્કરણ: https://ekakinchan.blogspot.com/2019/12/blog-post.html
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१.
दिसंबर आधे से ज्यादा बीत चुका था पर अभी शीतलहर जैसे हालत नहीं थे। हाँ धूप सेकने में आनंद आये उतनी ठंड तो थी ही. मैं हर दिन की भांति गंगा किनारे की मेरी मनपसंद जगह पर प्रवासी पक्षी दिख जाये उस आशा में खडी थी। उतने में कुछ दूर हलकी सी हलचल लगी तो मैंने कैमरा उस तरफ किया। देखा तो एक छोटा गिरगिट १५-२० फुट दूर पेड पर पत्तों के पीछे से मेरी तरफ देख रहा था. ये सोच कर की वो मुझसे डर रहा है, मैं थोड़ा पीछे हटने ही वाली थी के वो छिपने के बदले पूरा बहार आ कर धूप सेंकने लगा। मैंने भी पीछे हटने के बजाय उसका फोटो ले लिया और वो भी और पास जा कर।

लेकिन जिस तरह से मेरे वहां होने से डरा नहीं बल्कि मुझे तो वो उपर से आश्वस्त लगा, वो कुछ मेरी समझ में नहीं आया. पहले तो कभी कोई गिरगिट ने मेरा खास स्वागत नहीं किया था। पर जैसे ही मैं वहां से जाने लगी तो उसी पेड पर बैठा हुआ एक कौवा दिखा। अब समझ में आया की गिरगिट मुझे ढाल बना कर धूप सेंक रहा था।

ऐसा ही कुछ थोड़े दिन पहले भी हुआ था जब एक छोटी गिलहरी ने गुलाबी मैना के समूह ने मुझसे दूरी बनायीं रखी थी उसका उपयोग करते हुए मेरे पास के फुलों से अपनी पेट पूजा कर ली थी।
यहाँ मैं इस बात पर जोर देना नहीं चाह रही हूँ की हमारे आसपास के पशु पक्षी हमारा उपयोग कैसे करते है, वह तो एक सामान्य बात है (जैसे मेरे बहुत से पक्षी मित्रों ने मुझे उन्हें खाना देना, पानी रखना तथा उसकी सुरक्षा करना ऐसे काम दे रखे है), पर यहाँ तो ऐसे लोग जिनसे मेरी जान पहचान बिलकुल नहीं है तथा वो मनुष्य से व्यवहार करने के अभ्यस्त भी नहीं है, तदुपरांत भी उन्होंने presence of mind दिखाते हुए कैसे वर्तमान परिस्थिति में अपने लिए जो श्रेष्ठ था वो कैसे चुना।

पूरी तरह से अनजान तथा आकस्मिक आन पड़ी परिस्थिति में दो एक दूसरे से अपरिचित व्यक्तियों ने कैसे संवाद स्थापित किया उस बारे में एक बात याद आ रही है। जो अगली कडी में.
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२.

लगभग ग्यारह बजे थे। बाहर कुछ गडबड लगी, थोडी देर तो ध्यान नहीं दिया पर फिर जा के देखा तो एक शिकरा बाज जमीन पर एक बडे से पिले फल को पकडे बैठा था। उतना तो समझ में आया के दृष्टि भ्रम है इसलिए ठीक से देखने के लिए में उसकी तरफ बढी। शिकरा मुझे आती देख उड गया और वो बडा पीला फल एक हरियल (yellow footed green pigeon) था।

मेरे एकदम पास जाने पर भी वो बिलकुल नहीं हिला और मेरे उसको उठा कर अंदर लाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं की. पूरी रात चली बारिश से वो पानी में भिगोये हुए स्पॉन्ज की तरह भीगा हुआ था। थोडा घायल था पर ऐसे ठीक ठाक लग रहा था। पर डरा हुआ बहुत ज्यादा था। 

थोडी देर उसको अकेला छोडना ही अच्छा होगा यह सोच कर मैंने उसके सामने पानी, मुरमुरे (लाई) रखे, उसको साफ किया, घाव पर हल्दी डाली और दूर चली आयी। मुरमुरे देने के पीछे मेरा आशय उसको तुरंत कुछ खिलाने से ज्यादा मित्रता का हाथ बढाना था। वो तो लेकिन अपना मुंह दीवार की तरफ करके आँख बंध करके बैठ गया न उसने खाने की तरफ कोई ध्यान दिया, न मेरे मित्रता के प्रस्ताव पर। एक दो बार मैंने दूर से ही उससे बात करने का प्रयत्न किया तो वो अपने शरीर को दीवार के और पास धकेलने लगा।   

ऐसे ही तीन घंटे निकल गए। वो अभी भी डरा हुआ सा दीवार की तरफ मुंह करके सो रहा था। हालांकि अब वो मेरे उससे बात करने को स्वाभाविकता से ले रहा था भले ही प्रतिक्रिया कुछ भी न दी हो। देर से ही सही मुझ में अक्ल का संचार हुआ। गूगल किया के हरियल खाते क्या है। देखा तो वो तो फल खाते है। तो अब मैंने उसके सामने संतरे की चिर रखी। बंध दिख रही आँखों के किनारे से उसने संतरे की तरफ देखा। और अचानक ही उसके हावभाव पूरे बदल गये। उसने संतरे की तरफ देखा फिर मेरी तरफ फिर संतरे की तरफ और अब उसकी आंखें पूरी खुली थी डर उसमें कहीं नहीं था बल्कि अब वो विश्वास और आशा से भरी हुई थी। उसकी गरदन जो अब तक कंधों के बीच में धसी हुई थी अब ऊंची थी तथा और ६० seconds बाद वो दीवार नहीं मेरी तरफ मुंह करके बैठा था। खाने में अभी भी उसने कोई रुचि नहीं दिखायी।

कुछ देर बाद उसने उडने का प्रयास किया। लेकिन छोटी सी बंध जगह जिसको हम मनुष्य घर कहते है वो उसे बिलकुल समझ नहीं आयी और वो यहां वहां ठुक के अंत में कुछ ४ फीट की ऊंचाई पर एक पाइप पकड के बैठ गया। इससे वो फिर से खूब डर गया और अपनी लाक्षणिक दीवार में मुँह वाली मुद्रा धारण करके बैठ गया। वो भले ही निराश हुआ पर मैं इस प्रकरण से आशान्वित हो गयी। उसके न मात्र पैर, आंखें और सामान्य स्वास्थ्य ठीक ठाक था, उसके पंख भी ठीक थे। और जहां तक उसमें पुनः विश्वास जगाने की बात थी, मुझे विश्वास था के जो एक बार हुआ था तो फिर से भी होगा। में उसको अमरूद देती हूँ, कोई प्रतिक्रिया नहीं। संतरा, नहीं। केला, नहीं। पानी, नहीं। वो जैसे पत्थर की मूरत बन गया था। 

उत्साह लेकिन बहुत उपयोगी वस्तु है। मुझे पता था क्या करना है। मैं उसके पास की खिडकी खोलती हूँ। वहां मच्छरजाली लगी हुई है इसीलिए हरियल को बहार से कोई भय नहीं है। मै रोटी के छोटे छोटे टुकड़े करके मेरे babbler (सात भाई) मित्रों को बुलाती हूँ। वो तुरंत ही आते है और खूब जोर जोर से चिल्लाते हुए आनंद के साथ रोटी पर टूट पडते है। हरियल के पास इनके आनंद से अछूता रहने का विकल्प ही नहीं है। वो पुनः मेरी तरफ मुंह करके बैठता है और मुझे पता है के अब वो कभी भी दीवार की और नहीं मुडेगा। 

इसके पश्चात निचे की अंतहीन पुनरावृत्ति प्रारम्भ होती है। 
मैं उसके पास हर एक फल और पानी बारी बारी ले कर जाती हूँ। वो किसी वस्तु में रुचि नहीं दिखता। मैं फिर भी उसको खाने का आग्रह करती हूँ। वो अपना सर बाये दायें बाये दायें धीरे तथा उसके पश्चात द्रुत गति से घुमाता है। अपनी चोंच खोल बंध करके जैसे मुझे चले जाने के लिए भी कहता है। मैं तथापि डटी रेहती हूँ। मुझसे बात करने का कोई अर्थ नहीं है यह सोच कर वो अपनी गरदन पूरी घुमाकर मुंह अपनी पीठ में डालकर सो जाता है। मैं हार स्वीकार करती हूँ अगले १-२ घंटों के लिये। जिसके बाद इस पूरी प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। 

दूसरे दिन की सुबह। मैं उसे आगे वाले रूम में ले जाने का तय करती हूँ। वो लेकिन इस बात पर तैयार नहीं होता के मैं उसे पकडूं। मैं उसे अपने हाथ पे बैठने को कहती हूँ जो उसको ठीक लगता है। मनुष्य के हाथ पर सवारी करता हुआ जब वो घर को प्रवासी कुतूहलता से देखता हुआ जाता है तो वो क्या सोचता होगा। की ये भूमिबद्ध प्राणी विचित्र है तथा मूर्ख भी पर कदाचित जितने कुख्यात है उतने भी बुरे नहीं है?

खैर हम आगे वाले कमरे में पहुँच जाते है। मेरी इच्छा है की वो खिड़की के पास वाली मेज पर बैठे। पर महाशय की इच्छा मेरी इच्छा से मेल नहीं खाती। अब उसे मेरे हाथ से उतरना नहीं था। जैसे जैसे मैंने उसे हाथ से उतरने की प्रेरणा दी ऐसे ऐसे मेरे हाथ पर उलटी और चढता गया और अपने शरीर को मेरे हाथ से दृढता से चिपका रखा। जैसे तैसे मैंने उसे मेज पर बिठाया। आगे का दरवाजा खोल कर फिर babblers को बुलाये। वो घर के अंदर आते है, मेज के आस पास हो हल्ला करते है थोडी देर सोचते है की हरियल के फल को भी अपना ही समझे या नहीं पर फिर ऐसा न करते हुए चले जाते है। दरवाजा खुला है हरियल को जाना हो तो वो जा सकता है पर उसकी ऐसी कोई इच्छा नहीं है। वो तो बस शांति से खिडकी के बाहर देखता रहता है। 

उसको आ कर २२ घंटे हो चुके है पर अभी तक उसने कुछ भी खाया पिया नहीं है। वो अगर शक्ति खाने के पाचन में न लगाकर स्वाथ्यलाभ में लगाना चाहता है तो ऐसा ही सही पर एक बूंद पानी भी नहीं? मुझे अब थोडी चिंता होने लगी है। हाँ यह तो है के पिछले २२ घंटों में वो उत्तरोत्तर ज्यादा स्वस्थ लग रहा है। मैं बहार जा के हरियल के मनपसंद दो अलग अलग पेड के बढिया से पके हुए फल ले आती हूँ। वो उसको भी नहीं देखता। बस शांति से बैठा खिडकी के बाहर देखता रहता है।

लगभग उसी समय जब कल उसको शिकरा ने पकडा था वो अचानक अशांत हो उठा। उसे बाहर जाना है। अभी के अभी। वो खिडकी से बाहर जाने का प्रयत्न करता है पर वहां मच्छरजाली लगी है। दीवार छत से टकरा कर प्रवेशद्वार के ऊपर परदे के रॉड पे जा बैठता है। मैं दौड कर दरवाजा खोलती हूँ। वो बाहर नहीं जाता। मैं मेरा हाथ ऊपर करके उसको आने को कहती हूँ, वो हाथ पर आ जाता है। मैं हाथ निचे लाती हूँ और वो खुले दरवाजे के सामने है।  वो अभी भी नहीं उड जाता है। मैं आगे बढती हूँ और अब हम खुले आकाश के निचे है। मैं उसे कहती हूँ की उसको अपनी दुनिया में लौटते हुए देख मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी पर अभी जाना है या नहीं उसका निर्णय उसे ही करना है। यदि वो अभी पूरा आश्वस्त नहीं है तो जितना चाहे उतना यहाँ रह सकता है। अभी के अभी जाना अनिवार्य नहीं है।

वो मेरी बात सुनता है फिर ऊपर देखता है। एक एक करके आस पास के सारे वृक्ष का निरीक्षण करता है फिर मेरी तरफ एक लंबे बिना कोई जल्दी वाले पल तक देखता है और अब उसके पैरो ने मेरा हाथ नहीं पकडा उसका भार अब उसके पंखों ने उठाया है। उसी नीम के पेड पर जा कर बैठता है जहां से कल गिरा था।

इससे आगे कहानी कहना सरल नहीं है। उसको अपनी दुनिया में लौटते देखने का आनंद और वो तीव्र संवेदना जो अचानक हुए ये ज्ञान से उत्पन्न होती है के अब तक आपका सम्पूर्ण चित्त जिस वस्तु में लगा था वो अपनी दुनिया में लौट चूका है दोनों साथ साथ कह पाना असम्भव सा है। 

थोडे प्रयत्न के बाद हरे पिले रंग के पत्तों के बीच में बैठे हुए वही रंगो वाले उसको मैंने ढूंढ निकाला। और अचानक याद आया - फोटो? मैं दौड कर कैमरा लाती हूँ और फोटो लेती हूँ। 

फोटो में एक बात पर ध्यान जाता है जो अब तक नहीं देखा था. उसके लम्बे लम्बे नाखून। उसी के साथ एक और वस्तु का भी भान होता है - मेरे हाथ पे तीन तीन इंच लम्बे लाल और सूजे हुए निशान। उसकी हाथ पर से निचे न उतरने की हठ के समय हुए होंगे।

वो पेड पे अकेला बैठा है। मैं अकेली निचे खडी हूँ। ५ -१० मिनिट के बाद वो फिर उडान भरता है। वो मेरे सर के उपरसे पसार होता है। क्या वो ठीक से उड रहा है - मैं नर्वसनेस के साथ देखती हूँ। और ये क्या, वो आगे वाले गुलमोहर पर नहीं रुकता, और ऊंचाई पर जाता है और दूर वाले एक ऊँचे बिना पत्तों के पेड पर जाकर बैठता है। एक पल तो मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता। उस पेड पे हरियल का एक झुंड पहले से ही बैठा है। वो अब न तो निर्बल था न ही अकेला।

दूर से उस पेड पर बैठा हुआ मेरा हरियल एक छोटे से बिंदु से ज्यादा नहीं लग रहा था। फिर भी, एक अंतिम बार मैं कैमरा उसकी तरफ करती हूँ। एक ऐसा फोटो जिसमें मुझे यह पता हो के ये बिंदु मेरा हरियल है वह भी मेरे लिये अमूल्य होता पर जब मैं फोटो लेती हूँ तो वो ऐसा आता है। सारे पक्षी मेरी तरफ पीठ और सामने की तरफ मुँह हो ऐसे बैठे है पर मेरा हरियल मुडकर पीछे मेरी ओर देख रहा है। 

वो कहीं उतनी दूर से भी देख न ले उस डर से आँसू को रोकते हुए मैंने कहने का प्रयत्न किया, मेरी चिंता मत करना, तुम खुशी खुशी जाओ।

Sunday, 22 December 2019

હરીયાળ

हिन्दी संस्करण: https://ekakinchan.blogspot.com/2019/12/blog-post_27.html
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1.

ડિસેમ્બર લગભગ અડધા ઉપર જતો રહ્યો હતો પણ ઠંડી હજી જોઈએ એવી નહોતી જોકે તડકામાંથી ખસવાનું મન ન થાય તેવી ઠંડી તો હતી જ. હું રોજ સવારની જેમ ગંગા કિનારાથી થોડી ઊંચાઈ વાળી જગ્યાએ શિયાળુ પક્ષીઓ શોધતી ઉભી હતી.

ત્યાં નજીકમાં થોડો સળવળાટ થયો હોય તેમ લાગ્યું કેમેરાથી જોયું તો 12-15 ફૂટ દૂર એક નાના ઝાડ પર પાંચેક ફૂટની ઊંચાઈએ પાંદડાની પાછળથી સ્હેજ માથું ઊંચું કરીને એક નાનો કાચિંડો મારી તરફ જોતો હતો. મને થયું કે એ મારાથી બીને સંતાય છે એટલે હું બે પગલાં પાછા લેવા જતી હતી ત્યાં તો એ બહાર આવી તડકો તાપવા લાગ્યો એટલે વળી થયું મારી હાજરીથી એને કાંઈ ફેર પડતો નથી તો લાવ એકાદ ફોટો પાડી લેવા દે.

ફોટો તો મેં એનો પાડયો અને ઘણી નજીકથી પાડયો, પણ જે રીતે મારી હાજરી અને નજીક જવાને એણે લગભગ ઉમળકાભેર કહેવાય એવી રીતે સ્વીકાર્યું તેની મને ખાસ ગડ ન બેઠી. પહેલા તો ક્યારેય કોઈ કાંચિડો મારી ઉપર આટલો મેહરબાન નતો થયો.
થોડી વાર પછી મેં પાછા જવાની તૈયારી કરી ત્યાં મારું ધ્યાન એજ ઝાડ ઉપર બેઠેલા કાગડા તરફ ગયું અને કાચિંડાના અસ્વાભાવિક વર્તનનો તાળો મળ્યો. એ કાગડાથી બચવા ઢાલ રૂપે મારો ઉપયોગ કરી રહ્યો હતો. જતાં જતાં એને 'હવે હું જાઉં છું કાગડા નું ધ્યાન મેળે રાખજે' કહી નીકળી.

આવોજ એક પ્રસંગ થોડા દિવસ પહેલા પણ બન્યો હતો જોકે તે વખતે મારો ઢાલ તરીકે ઉપયોગ કરવાવાળી એક નાની ખિસકોલી હતી જેણે વૈયાના ટોળાએ મારાથી થોડા દૂર રહેવાનું પસંદ કર્યું હતું તેનો લાભ લઈ મારી નજીકના ફૂલથી પેટપૂજા કરી હતી.


હું અહીં એ મુદ્દા પર ભાર નથી દેવા માંગતી કે આપણી આસપાસનાં પશુ પક્ષી આપણો ઉપયોગ કેવી રીતે કરતાં હોય છે. એમતો મારાં અનેક પક્ષી મિત્રોએ મને ચણ નાખવું, પાણી ભરવું અને એની ચોકીદારી કરવી વગેરે કામ સોંપેલા જ છે પણ તેઓ મને લાંબા સમયથી ઓળખે છે અને અમારી ઓળખાણ ધીમે ધીમે વધી છે. પણ અહીતો મુદ્દો તદ્દન અજાણ્યા વળી માણસ હેવાયા પણ ન હોય તેવાં જીવ પણ સમયસૂચકતા વાપરી પરિસ્થિતિ પ્રમાણે પોતાના વર્તનમાં કેવો ફેરફાર કરી લેતા હોય તે છે.

સંપૂર્ણ પણે અજાણી અને અણધારી પરિસ્થિતિમાં પણ presence of mind જાળવી રાખવા લગતી એક વાત યાદ આવે છે. જે આવતી કડી માં..

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2.

અગિયારેક વાગ્યા હશે. કંઈક ગડબડ લાગી છતાં થોડી વાર તો ધ્યાન ન આપ્યું પણ પછી બહાર જઈ જોયું તો જમીન ઉપર શકરો બાજ એક મોટું પીળું ફળ પકડીને બેઠો હતો.. ના એ ભ્રમ હતો એટલી તો ખબર પડી પણ સાચું શું છે તે જોવા હું તેની નજીક ગઈ. બાજ મને આવતી જોઈ ઉડી ગયો અને એ પીળું ફળ તે હરીયાળ (લીલા પીળા રંગ નું કબૂતર પ્રજાતિ નું પક્ષી - yellow footed green pigeon) હતું. મારાં એકદમ પાસે જવા છતાં તે એમનું એમ જ બેઠું રહ્યું અને એને ઉપાડીને અંદર લઈ આવી તોપણ સ્હેજ પણ વિરોધ ન કર્યો. લગભગ આખી રાત ચાલેલા વરસાદને લીધે તે પાણીમાં બોળેલા સ્પંજ જેટલું ભીનું લાગતું હતું. બહુ વધારે ઈજા થઇ હોય તેવું તો ન લાગ્યું પણ તે ખૂબ જ ડરેલું હતું.

થોડી વાર એને એકલું મૂકી શાંત થવું દેવું યોગ્ય લાગ્યું એટલે એની સામે થોડું પાણી, થોડા મમરા મૂકી, ચરક સાફ કરી, ઘા ઉપર હળદર છાંટી શાંતિથી બેસવા દીધું. જોકે વચ્ચે વચ્ચે તેની સાથે દૂરથી જ વાતો કરવાનો થોડો પ્રયાસ કર્યો પણ કોઈ જવાબ ન મળ્યો. મમરા દેવા નો આશય એને ખવડાવવા કરતાં  મિત્રતા સંદેશ દેવાનો હતો પણ એણે ના તો મમરા કે ના તો મિત્રતા સંદેશ તરફ ધ્યાન દીધું. એ તો બસ ભીંત તરફ મોઢુ કરીને બને એટલું ભીંતસરસું થઈ આંખ બંધ કરીને સૂતું જ રહ્યું.

આમ ને આમ ત્રણેક કલાક જતા રહ્યા પછી થયુ લાવ જોવા દે એ ખાય શું? ગૂગલ કર્યું તો ખબર પડી કે એતો ફળ ખાય. સંતરાની ચીરી હવે એની સામે મૂકી. એણે આંખના ખુણામાંથી સંતરા તરફ જોયું અને તે સાથે જ એના હાવભાવ સંપૂર્ણપણે બદલાઈ ગયા. આંખો માં આશ્ચર્ય અને આનંદ સાથે એણે સંતરાની ચીર તરફ જોયું,પછી મારી તરફ, ફરી સંતરા તરફ.. એની ત્રણ કલાકથી ભયથી મીંચેલી આંખ હવે પુરી ખુલ્લી અને જીવંતતાથી ભરેલી હતી અને ડોક જે અત્યાર સુધી ખભાની અંદર ખોસેલી હતી તે હવે ટટ્ટાર હતી. બીજી 60 સેકન્ડ પછી એ ભીંત તરફ નહિ પણ મારી તરફ મોઢું કરીને બેઠું હતું. હજી પણ ખાવા કે પાણી તરફ તેણે કોઈ રુચિ દર્શાવી નહિ.

થોડીક વાર પછી એણે ઉડવાનો પ્રયત્ન કર્યો. પણ, વિચિત્ર નાનકડી બંધ જગ્યા જેને આપણે માણસો ઘર કહીયે છીએ તેમાં એ ચકરાવે ચડી ગયું અને જ્યાં ત્યાં ભટકાઈ ને અંતે ચારેક ફુટ જેટલી ઊંચાઈએ એક પાઇપ ઉપર બેસી ગયું. આ નિષ્ફળ પ્રયત્નથી એ થોડું હતાશ થઇ ગયું પણ તે મારાંમાં ઉત્સાહનો સંચાર કરનારો પુરવાર થયો. એની માત્ર આંખ, પગ અને સ્વાસ્થ્ય સારું હતું એટલુંજ નહિ પણ એની પાંખો પણ ઈજાગ્રસ્ત હોય તેમ ન લાગ્યું. જોકે એ ઘણું ડરી ગયું અને વળી પાછું ભીંત તરફ મોઢું કરી, આંખ મીંચી બેસી ગયું. મને વિશ્વાસ હતો કે એક વાર મેં એનો જે વિશ્વાસ પ્રાપ્ત કર્યો છે એ ફરીથી પણ કરી શકાશે એટલે મેં એને ફરીથી સંતરું આપી જોયું, તેણે જરાય પ્રતિસાદ ન આપ્યો, જામફળ, એજ ઠંડો પ્રતિસાદ, કેળું, ના.

ઉત્સાહ જોકે ખુબ ઉપયોગી વસ્તુ છે. આ વખતે હું સ્હેજ પણ મુંઝાઈ નહિ કે હવે આની બીક દૂર કરવા શું કરવું. મેં એની નજીકની એક બારી ખોલી (બારીમાં મચ્છરજાળી લાગેલી હતી એટલે એને કોઈ બહારનો ભય ઉભો થવાનો પ્રશ્ન નહોતો). બારીની બહાર મારાં babbler (વન લલેડાં) મિત્રોને રોટલીના ઝીણા ઝીણા કટકા આપી બોલાવ્યા. બોલાવતાની સાથેજ 7-8 નું આખું ટોળું ખુબ જોર જોરથી કલબલાટ કરતું એની ઉપર તૂટી પડ્યું અને મારાં હરીયાળ પાસે એમના આનંદને અવગણવાનો વિકલ્પ જ નહોતો. એણે ફરી એક વાર ભીંત તરફ પીઠ કરી અને મને ખબર હતી કે હવે એ ક્યારેય પાછું ભીંત બાજુ મોઢું નહિ કરે.

ત્યાર પછી નીચેનાની અંતહીન પુનરાવૃત્તિ ચાલુ થાય છે.
હું તેની પાસે એક પછી એક બધા ફળ અને પાણી લઇ જઈ એની ચાંચ આગળ ધરું છું, એ જરા પણ રસ દેખાડતું નથી, હું તોય એને ફળો ધર્યા જ કરું છું, એ એનું માથું 15 ડિગ્રી ડાબે, 15 ડિગ્રી જમણે એમ ધીમે થી વધુ ગતિથી ફેરવે છે વળી પોતાની ચાંચ પણ ઉઘાડ બંધ કરી જાણે મને જતા રહેવા કહે છે. હું તોય નથી જતી તો છેવટે એ ડોક વાળી, માથું પીઠમાં ખોસી સુઈ જાય છે. હું અંતે હાર માનું છું. 1-2 કલાક સુધી. જ્યાર પછી આ આખી પ્રક્રિયાની પુનરાવૃત્તિ થાય છે.

બીજા દિવસ ની સવાર. હજી સુધી એણે કાંઈ ખાધું તો નથી જ પણ પાણીનું પણ એકેય ટીપું નથી લીધું. હું એને આગળના રૂમમાં લઇ જવાનું નક્કી કરું છું. પણ એ મને પોતાને પકડવા દેવાની અનિચ્છા જતાવે છે. હું એના પગ આગળ આંગળી લઈ જઈ એને મારી આંગળી પર બેસવા કહું છું જે એને બરાબર લાગે છે અને આંગળી ઉપર આવી જાય છે.

માણસના હાથની સવારી કરતું એ જયારે ઘરમાંથી પસાર થાય છે ત્યારે શું વિચારતું હશે? કે જામીનસાથે બંધાયેલા થોડા વિચિત્ર અને સમજાય નહિ એવા આ પ્રાણીઓ મૂર્ખ છે પણ કદાચ એમની (કુ)ખ્યાતિ જેટલા ખરાબ નથી.. ખૈર, અમે આગલા રૂમમાં પહોંચીએ છીએ. મારી ઈચ્છા એને બારી પાસેના ટેબલ પર બેસાડવાની છે પણ હવે ભાઈસાહેબને હાથ પરથી ઉતારવું નથી. હું જેમ જેમ એને ઉતારવાના પ્રયત્નો કરું છું એમ એમ એ પાછું ખસતું જાય છે અને તેના શરીરને મારા હાથ સાથે બળપૂર્વક દબાવી ઉતરવું નથી એમ જીદ કરે છે. જેમ તેમ કરીને હું એને ટેબલ પાર બેસાડું છું અને ફરી babblers ને બોલવું છું. આ વખતે એ લોકો આગલા બારણામાંથી અંદર આવે છે, ધમાલ મચાવે છે, હરીયાળ ની સામે પડેલા ફળ પણ પોતાના માનવા કે નહિ એનો થોડો વિચાર કરે છે પણ પછી એમ કર્યા વગર પાછા જતા રહે છે. આગળનું બારણું ખુલ્લું જ છે, હરીયાળ ને જવું હોય તો. પણ એને બહાર જવામાં રસ નથી.  

એને આવીને લગભગ 22 કલાક થયા પણ હજી સુધી એણે કાંઈ ખાધું પીધું નથી. મને જોકે એના ન ખાવા અંગે ખાસ ચિંતા નથી, જો એ પોતાની શક્તિ ખોરાક પચાવવામાં  વાપરવાને બદલે ઝડપથી પૂર્ણ સ્વસ્થતા મેળવવા માટે વાપરવા માગતું હોય તો એમ ભલે. પણ સાવ એકેય ટીપું પાણી પણ નહિ? એનાથી હવે મને થોડી ચિંતા થવા મંડી હતી (જોકે પાછલા 22 કલાકમાં એ વધુ ને વધુ સ્વસ્થ લાગતું હતું છતાં પણ..). છેલ્લા પ્રયાસ તરીકે હું બહાર જઈ એમના મનપસંદ બે અલગ અલગ ઝાડના સરસ પાકેલા ટેટા લઈ આવી. નજીકમાં જ હતા ઝાડ. એણે એ ટેટામાં પણ કોઈ રસ ન લીધો. બસ, બેઠા બેઠા શાંતિથી બારીની બાર જોયે રાખ્યું.     

લગભગ જે સમયે કાલે બાજે એને પકડયું હતું તે સમયે અચાનક એ રાઘવાયું થાય છે. એને બહાર જાવું છે - હમણાં ને હમણાં. બારીમાંથી બહાર જવાનો પ્રયત્ન કરે છે પણ ત્યાં મચ્છરજાળી છે. બારણું બંધ છે. આડું અવળું ઉડી ભીંત, છત સાથે અથડાય છે અને છેવટે પડદાના રૉડ પર જઈ બેસે છે. હું તરત જ આવી બારણું ખોલું છું પણ એ એની મેળે બહાર જતું નથી. હું એને ઊંચો કરી મારો હાથ ધરું છું અને એ હાથ પર આવતું રહે છે.

હું હાથ નીચો લાવું છું, એ હવે ખુલ્લા બારણાની સામે છે પણ ઉડી જતું નથી. બે ડગલાં બહારની તરફ અને અમે ખુલ્લા આકાશ નીચે ઉભા છીએ. હું એને કહું છું કે એને પોતાની દુનિયામાં હેમખેમ પાછું જતા જોઈ મને ખુબ આનંદ થશે પણ હમણાં જવું કે નહિ એ નિર્ણય એણે લેવાનો છે. અત્યારે જ જવું એવું ફરજીયાત નથી. જો હજી એને પૂરો વિશ્વાસ ન હોય તો એ જેટલું રોકાવું હોય તેટલું રોકાઈ શકે છે. એ મારી વાત સાંભળે છે, પછી ઉપર જોવે છે, આસપાસના દરેક ઝાડનું શાંતચિત્તે નિરીક્ષણ કરે છે, પછી મારી સામે એક લાંબી, સહેજ પણ ઉતાવળ વગરની પળ સુધી જોવે છે અને.. એના પંજાએ હવે મારા હાથને નથી પકડયા. એનો ભાર હવે એની પાંખો પાર છે. જે લીમડાના ઝાડ પરથી કાલે એ પડ્યું હતું એ જ ઝાડ પર જઈને બેસે છે.

આ ક્ષણથી આગળ વાર્તા કહેવી સહેલી નથી. એને પોતાની દુનિયામાં હેમખેમ પાછું જતા જોવાનો આનંદ અને જેમાં તમારું ચિત્ત પૂર્ણપણે જેમાં રોકાયેલું હતું એ પોતાની દુનિયામાં પાછું જતું રહ્યું છે એ વાતનું અચાનક જ્ઞાન થતા ઉઠેલી તીવ્ર લાગણી એ બંનેને એક સાથે વર્ણવવી જાણે અશક્ય છે.

થોડા પ્રયત્ન પછી પાનખરના લીલા પીળા પાંદડામાં એકરૂપ થઇ ગયેલા એને હું શોધી શકું છું. હવે યાદ આવે છે - ફોટો તો એકે લીધો નથી. ઝડપથી અંદર જઈ કેમેરા લાવું છું અને ફોટો પાડું છું.

ફોટામાં એક વસ્તુ પર ધ્યાન જાય છે જે અત્યાર સુધી નહોતી જોઈ. એના પંજા ના નખ. અને તે સાથે જ મારુ ધ્યાન એક બીજી વસ્તુ પણ ગયું - મારા હાથ ઉપર ત્રણ ત્રણ ઇંચ લાંબા અને ઊંડા ઉઝરડા હતા જે ખુબ લાલચોળ થઇ સોજી ગયા હતા. મારા હાથ પરથી ન ઉતરવા માટે એણે લીધેલા જીદભર્યા ડગલાંને લીધે પડયા હશે.

એ ત્યાં ઝાડ ઉપર એકલું બેઠું હતું અને હું એકલી નીચે ઉભી હતી. 5-10 મિનિટ પછી એ ઉડ્યું. એ ઊંચાઈ પકડે છે, મારા માથા ઉપરથી પસાર થાય છે, હું ખુબ નર્વસ થઈને જોઉં છું એ બરાબર ઉડે છે? અને આ શું?એ થોડી દૂરના ગુલમહોરના ઝાડ પર નથી રોકાતું, વધુ ઉંચે ઉડી 70-80 ફૂટ દૂરના એક પાંદડા વગરના ઊંચા ઝાડ પર બેસે છે. એકદમ તો મને મારી આંખો પર વિશ્વાસ ન થયો. એ જે ઝાડ પર જઈને બેઠું હતું તેની ઉપર એની જાતિના પક્ષીનું મોટું ટોળું પહેલાથી જ બેઠું હતું. એ હવે નબળું પણ નહોતું અને એકલું પણ નહોતું.

દૂરથી એ ઝાડ પર બેઠેલું મારું હરીયાળ એક નાનાં ટપકાથી વિશેષ નહોતું જણાતું પણ છતાં, હું એક છેલ્લી વાર કેમેરો એની તરફ કરું છું. એક એવો ફોટો પણ મારે માટે અમૂલ્ય બની રહેત જેમાં કયું ટપકું એ છે એ મને ખબર હોય પણ જયારે હું ફોટો લઉં છું ત્યારે એ આવો આવે છે. બધા પક્ષી મારી તરફ પીઠ અને સામેની તરફ મોઢું એમ બેઠા છે પણ મારું હરીયાળ ડોક ફેરવી મારી તરફ જોઈ રહ્યું છે.
રૂંધાતે અવાજે મેં એને કહેવાનો પ્રયત્ન કર્યો 'મારી ચિંતા કરતું નહિ. આનંદથી જાજે.'

Tuesday, 15 October 2019

बहुश्रुता देवनागरी

क्या आप के साथ कभी ये हुआ है?

- आपने दूसरे प्रांत के व्यक्ति से बात करते समय कोई अर्थ के लिये उचित इंग्लिश/हिन्दी शब्द याद नही आने पर ये कहा है 'हम तो इसे ये कहेते है' और जवाब में उसने कहा हो 'मेरी भाषा में भी यही शब्द प्रयोग होता है'.
- आप भारत के ऐसे राज्य में हो जहां की भाषा आप के लिए 'काले अक्षर भेंस बराबर' हो, आसपास के लोग क्या बोल रहे है कुछ समझ नही पा रहे हो पर उसी भाषा में जब आकाशवाणी समाचार सुनते हो तो बहोत मात्रा में उसे समझ पाये हो?
- आपने कभी अन्य भारतीय भाषा के कोइ नये शब्द को प्रथम बार सुनने पर भी उसका अर्थ सहज ही जान लिया हो?

तो आप ने भारतवर्ष के कितने ही दूर के व्यक्तिओं के बिच की स्वाभाविक निकटता को अनुभव किया है. 

बहुश्रुता देवनागरी यही निकटता को अनावृत्त करने की दिशा में एक प्रयास है.

बहुश्रुता देवनागरी एक font है जो भारत की अन्य भाषा को देवनागरी लिपि में दिखायेगा. जैसे, यह tweet जो बंगाली में है पर बहुश्रुता के उपयोग से देवनागरी में पढ़ा जा सकता है. 
अगर आप बंगाली बिलकुल नहीं जानते है तो क्या आपने कल्पना की थी के आप इस tweet के इतने सारे शब्द समझ पायेंगे?


ऐसे ही ये


सब भाषाएँ इतनी सरल न भी लगे तो जो अन्य भाषा सिखने का प्रयास कर रहा है उसके लिये यह देवनागरी में निरूपण लाभदायी हो सकता है ऐसी मेरी आशा है. 
और हां, आप सरलता से अन्य लिपि में लिख भी सकते है. बस गूगल इनपुट टूल्स में भाषा चुनिए और लिखिये - वह दिखेगा देवनागरी में पर लिखा जायेगा चुनी हुई भाषा में. जैसे मैंने बहुश्रुता के twitter account के profile header में भारत लिखा है. 

अन्य लिपि को देवनागरी में परिवर्तित करते समय कुछ त्रुटियां रहेती है जो इस समय दूर नहीं हो सकती। जैसे की कुछ लिपिओं की ह्रस्व इ की मात्रा आगे दिखाना संभव नहीं है तो उनके लिए वो पीछे ही दिखायी गयी है हलाकि उसे दीर्घ इ से अलग दिखाया गया है।

बहुश्रुता देवनागरी के कुछ अन्य उदाहरण आप यहां देख सकते है।
https://twitter.com/bahushrutaFonts/status/1195621927835987968

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बहुश्रुता का उपयोग कैसे करें?(for  desktop, chrome/IE)
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- यहाँ से ttf फाइल डाउनलोड करे:
- font download (right click -> save link as) और install करें 
- in chrome -> settings -> appearance -> select bahushruta devanagari for standard and sans serif
- For internet explorer, go to Tools, Internet options, Fonts on General Tab.

If you are updating to newer version,
Close all instances of browser (or remove Bahushruta from fonts settings) before installing new file.
if newer version is installed while older still in use (browser open), change will take effect only after computer restart.

और जानकारी या प्रश्न के लिये https://twitter.com/bahushrutaFonts/ पे जा सकते है।

How I happened to do this?
its here. https://ekakinchan.blogspot.com/2019/10/bahushruta-devanagari.html

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Notes for technically oriented people or for those who want to understand better how lipi barrier can be removed more effectively.

Note 1: Easier / less resistance step may be

Its kind of tragic that to read our scripts interchangeably, we need to make such efforts when it could be done very easily if reading one script in another was not BLOCKED. yes, you read it right. what is needed is removal of block and not additional feature per se. (okay, strictly in technical sense, it cannot be proved a block, but its still more like it).
Let me explain.

Fonts work like this.
i) They take in ISO codes,
ii) apply rules of script display (decide if matra comes before, after, above, below etc),
iii) apply symbols assigned to ISO codes
iv) apply rules to customise / manipulate actual display based on sequence of ISO codes. (say, if क् is followed by श र or क respectively, display will be  क्ष क्र क्क.)
and display.

Now a font developer has control over iii) and iv) only. and ii) is pre-specified (at OS level?) and font developer's choice is restricted. It automatically assumes which rules can be allowed based on ISO block, and restricts its assumption to only one set of rules. i.e. you can ask for application of devanagari script rule only on devanagari ISO block. Only if such restriction is lifted and if we can ask for devanagari script rule to be applied on say Malayalam, Gujarati or Bengali ISO block, most of the work (and all of the unsolvable problems) go away.


Note 2: Unifying ISO blocks - seeing varnas for what they are - uchharan and not as language units.

Probably in most non Indic languages people dont speak what they read which messes up things quite a lot. But for us, Language is association between शब्द and अर्थ while lipi is association between वर्ण / वर्ण शृङ्खला and written symbol. Which means that अ, ਅ, અ, অ, ଅ, അ, ಅ, అ all are symbols for same varn in different lipi and it has NOTHING to do with language (in current ISO system, they all are different entities). Now, because what symbol to use is anyway supplied from font file, role of ISO code is only to convey वर्ण शृङ्खला. We therefore actually need only ONE BLOCK of ISO codes ACROSS all Indic languages. Display lipi can be decided by input user's intended lipi (default) or reader's preferred lipi (override).

This would conceptually and practically simplify things greatly and also do away with a whole lot of ISO codes and would greatly reduced work for everyone. Though I am not hopeful of we having such a simple solution - for, we are not आत्मनिर्भर in any technical aspect..

Bahushruta Devanagari

Removal of bottleneck of different lipi from our languages was something I wished for long. That would instantly make us understand many languages partially, make it easy to learn remaining part if we are trying to learn. and most importantly, with opening up of windows to our other languages, our default vocabulary can become richer with more original, more meaningful words and we may be able to arrest our fall on slippery slop of losing languages to shallow vocabulary of entertainment media taught/English words and in turn losing communication ability and in turn pravrutti to truly express ourselves well and in turn our core sanskar of thinking.

but had no idea how (or if) that can be done. some three weeks back, heard about an attempt of common script (called bharati) - I was overjoyed (even while knowing how hard it might be, if not impossible to go that way, as it would require not only giving up all 'our' scripts but also that it would require putting in effort to learn new script.) I was overjoyed that people recognise this barrier and working towards eliminating it.

I immediately started learning it but process of learning didn't stay on course for long, because the way it was implemented caused me ask myself, why then we cant simply read all languages as they stand in respective scripts in our own scripts? it obviously looked easily doable, then why we don't have it? its immense utility on one hand and obvious doability on the other, combined with fact that we don't do it in reality, baffled me. I could not think of any explanation but that I am missing something completely. but I could not find that missing piece. so, thought of trying to find it 'practical' way. I may either come to know that its not doable or that its not useful.

problem now was, I could see that it was doable (because I had already seen it done for bharati), but had no idea how and that even if I find out 'how', whether it would be possible for me to do it for myself (I am not exceptionally brilliant, you know. ok, you can drop exceptionally easily). it took me two three days of clueless googleing to start getting clues of what to google. even after I fairly started, I did manage to get completely stuck with trivial problems, managed to waste time with silly mistakes but finally, I had a working draft of bahushruta devanagari. while it still had some aesthetics issues as well as there is undone work, it started meeting my own requirement. so much so that my twitter usage on mobile started becoming uncomfortable - bahushruta was there only on comp and now I did not like to see text I couldn't read (even thought I knew some of those tweets were not what I was actually very much interested in but were recently added only because I wanted other language stuff to land on my feed).

So, my 'practical' was partially over, it proved both doable and useful. for rest of the answer, I think time will answer that.

To know more about Bahushruta Devanagari see,
https://ekakinchan.blogspot.com/2019/10/blog-post.html

P.S. Managed to resolve most issues and I think for now, its at fairly working level.

Saturday, 7 September 2019

Watching ISRO launches and changing emotions

"This will be very significant leap forward." commentator was speaking on DD. With huge excitement he explained how capabilities of this vehicle was three times of current vehicle. I was watching live launch telecast for the first time. What was carrying India's dream was ASLV-D4, capable of carrying 150 kg to LEO. for me, till date it remains one the most exciting launch telecast watched.

Excitement level continued to be high for some time, but with PSLV, seeing launches became more of predictable celebrations. yes, each launch carried some 'first time' feature where you were supposed to hold your breath and I did that dutifully, but still, expectation slowly settled to only happy ending. A particular success now was no longer meant that Indian dream was alive. It was alive anyway.

Then came GSLV. thankfully however for me, I didn't notice developments there initially for reasons like wonderful PSLV, cryogenic engine was anyway not indigenous, my own inability to watch launches for few years in between. but by 2010, it appeared like India dream wont stay alive if GSLV doesn't take it over. We had own cryogenic engine too with GSLV D3. Its failure was very disappointing.

We were back to non indigenous cryogenic engine in next launch - but whatever, it was still a GSLV and I took my seat in front of TV. In a minute of launch, a fire ball, shattered pieces of rocket - no, of India's dream, was on screen. that was one of the most acute shock and despair that I experienced.

Watching launches after that were exactly opposite to what I started with. Now, I didn't feel excited with success but was anxious about failure.

Fast forward to yesterday night. it was.. deviation from path? it seems to be correcting itself. Again?, no no its fine probably. Freefall? holding breath for non significant few moments and when next tick didn't appear, accepting that it was gone most probably. There was no feeling of despair even after that acceptance.

So, today ISRO has come a long way. It is not so small that one success would hugely boost its capability and its not so weak that one failure would put any question mark on India's dream. Now, one particular success or failure is just that. one particular success or failure.

We have learned from childhood that we should not get too excited in success and not despair in failure. Now I think it implies, be advanced and strong (and therefore able and confident) enough where success or failure doesn't affect path you are walking on anymore, for what you see in front of you causes those emotions.