तो मैंने फिर एक बार अष्टाध्यायी पढना प्रारम्भ किया था। (फिर एक बार और प्रारंभ साथ साथ लिखने से मुझे बहोत पाप लगेगा ऐसा लग रहा है पर..). विषयवस्तु समझना ज्यादा क्लिष्ट नहीं लगा जिसमें ९९% कारण आचार्य थे। पर मेरी दो अक्षमताओं के चलते पढाई जैसी चलनी चाहिए ऐसी नहीं चल रही थी।
वैसे तो वस्तुओं को कठंस्थ कर पाने का सामर्थ्य प्रारम्भ से ही बहोत अधिक नहीं था पर गत कुछ वर्षों में तो वो मैंने पूर्णतया खो दिया था। ऐसा होने के मुख्य तीन में से दो कारण थे, १) जब जो चाहिए वो गूगल या हार्ड डिस्क में है ऐसा विश्वास हो जाने से पिछले दो दशक से स्मृति का उपयोग करना बिलकुल छोड दिया था। (जबकि ऐसा करना मूर्खता है यह समझ में आये भी कुछ समय हो गया पर नष्ट हुआ सामर्थ्य पुनः प्राप्त करने के लिये पुरुषार्थ कौन करेगा?) २) मन ने ये दृढ विश्वास कर लिया था की अब मैं कुछ भी कठंस्थ नहीं कर सकती इसका अर्थ यह था की सूत्रपाठ अथवा धातुपाठ तो छोडो, रामः रामौ रामाः भी मेरे बस की बात नहीं थी।
दूसरी अक्षमता यह थी की कुछ हद तक एक बार समझ लेने पर भी वस्तुओं को भूल जाती थी। यह समस्या का निवारण हलाकि पहेली समस्या की भांति असंभव नहीं था। (ठीक है, पर्याप्त पुरुषार्थ करने पर असंभव तो पहेली समस्या का निवारण भी नहीं होगा..). इसके दो समाधान हो सकते थे। मैं अकेले घर बैठे पढने के बदले समूह अध्ययन का हिस्सा बनूं अथवा कोई ऐसे व्यक्ति को पकडूं जिसे मैंने जो पढा है वो पढा सकूं। पर यह दोनों रास्तें बहोत बंधनकारी तथा महेंगे (शक्ति व्यय की दृष्टि से) लगने से मैंने नहीं लिये। तो अब क्या करें?
एक मार्ग था। मैंने कंप्यूटर को पढाने का निश्चय किया। पर एक समस्या और थी। मुझे कोई प्रोग्रामिंग लैंग्वेज नहीं आती थी। पर्याप्त मात्रा में ठोकरें खाने के बाद एक पुस्तक मिली - A byte of python. लेखक शिक्षक की उंगली पकडके सिखना प्रारम्भ किया और पता ही नहीं चला कब वो उंगली छोडके आगे का मार्ग स्वयं (google / stackexchange की दुनिया में) ढूंढना प्रारम्भ हो गया। एक लम्बे लगने वाले प्रयत्न के उपरांत मेरे प्रोग्रामने सर्वप्रथम शब्द 'भागः' बनाया। (output given at the end)
कोई मनुष्य के बदले कंप्यूटर को पढाने का फायदा यह था की वो स्वयं कुछ भी नहीं समझेगा इसलिए जब तक मैं ठीक ठीक समझके ठीक ठीक समझा नहीं पाती, वो सही परिणाम नहीं देगा। पर एक नुकसान भी था। वो ये की जिस उद्देश्य से उसको पढाना प्रारम्भ किया था उसकी पूर्ति होना तो दूर, यह उलटा पड सकता था। (क्योंकि जब एक बार कंप्यूटर को समझा दिया है तो वो सदा याद रखेगा - मुझे याद रखने की क्या आवश्यकता है?)
पर यह एक रसप्रद प्रयोग बना। मेरा पढना पढाना zero knowledge reserve के साथ चल रहा था. यानि,जीतनी बातें अष्टाध्यायीकी आचार्य से सीखी (https://archive.org/details/Ashtadhyayi-Prathamavritti) उतनी का प्रोग्रामिंग कर दिया और उतना प्रोग्राम करने के लिए जीतनी python आनी चाहिए उतनी सिखी। इसका अर्थ यह भी था की जैसे ही मैं अगला पाठ पढती - जो पूर्व सीखी वस्तुओं को विस्तारित करता, मेरा अब तक का सारा काम ध्वस्त हो जाता। मेरा प्रोग्राम सही अर्थमें iterative पद्धति से आगे बढ रहा था। दो तीन महीने बाद एक बहोत ही उत्कृठ तथा उपयोगी साइट http://ashtadhyayi.com/ मिली जिससे सीखना और सरल हुआ। ऐसे ही आगे चलके http://avg-sanskrit.org/sutras/ से भी लाभ मिला।
वैसे यह प्रयास मेरी अनियमितता से अछूता नहीं रहा। बिच बिच में १-२ महीने ध्यान कहीं और भटक जाना स्वाभाविक रहा पर इस बार अवकाश थोडा लंबा ही चला है। ६ महीने हुए ध्यान भटके हुए पर ईश्वर ने चाहा तो कुछ दिनों में इसपे फिर कार्य हो पायेगा। (in a way this post also serves to remind myself to restart working on this front. as of now, I fear I have not only forgot almost all Ashtadhyayi learning as before, but also some of what my program does too.)
--------------------------------------------
`https://archive.org/details/Ashtadhyayi-Prathamavritti में सर्वप्रथम शब्द 'भागः' बनाया गया है जो इस समय मेरा प्रोग्राम कुछ ऐसे बनाता है।
धातु: भजँ॑_सेवायाम् से ['भाव', 'क्रिया के अपने भाव को कहेने के अर्थ में'] अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन का शब्द बनाना है
['धातु'] के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् धातु है: भज् और ['अँ॑'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
भज् धातु से भाव अर्थ में 3.3.18 सूत्र से घञ् प्रत्यय होता है
['घञ्'] प्रत्यय की संज्ञा ['कृत'] भी है
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: अ और ['घ', 'ञ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
धातु का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
घञ् प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
['7.2.116 अतः उपधायाः', ['भ', 'अ', 'ज'], '->', ['भ', 'आ', 'ज']]
['7.3.52 चजोः कु घिन्ण्यतोः', ['भ', 'आ', 'ज'], '->', ['भ', 'आ', 'ग']]
घञ् प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['भ', 'आ', 'ग'], ['अ']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['प्रातिपदिक']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् के अधिकार में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् विभक्तिप्रत्यय है: स् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['अङ्ग', 'पद - प्रत्यय सहित']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['भ', 'आ', 'ग', 'अ'], ['स']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['पद - प्रत्यय सहित']
पदस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
पूर्वत्रासिद्धम्
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: र् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['8.2.66 ससजुषो रुँः', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'स'], '->', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'र']]
['8.3.15 खरवसानयोर्विसर्जनीयः', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'र'], '->', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'ः']]
पदस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
भज् ( भजँ॑ ) धातु से भाव अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन में भागः शब्द बनता है
---------------------------------
धातु: लूञ्_छेदने से ['क्रियासमभिहारे', 'क्रिया को बार बार करने के अर्थ में'] अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन का शब्द बनाना है
['धातु'] के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् धातु है: लू और ['ञ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
लू धातु से क्रियासमभिहारे अर्थ में 3.1.22 धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् सूत्र से यङ् प्रत्यय होता है
['यङ्'] प्रत्यय की संज्ञा ['सनादि'] भी है
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: य और ['ङ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
6.1.1 एकाचो द्वे प्रथमस्य ['ल', 'ऊ', 'य']
6.1.4 पूर्वोऽभ्यासः ['ल', 'ऊ', 'य']
6.1.5 उभे अभ्यस्तम् ['ल', 'ऊ', 'य', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ']
6.1.9 सन्यङोः
['6.1.66 लोपो व्योर्वलि', ['ल', 'ऊ', 'य', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ'], '->', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ']]
धातु का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['धातु'] के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
लूय धातु से क्रियासमभिहारे अर्थ में 3.1.34 वार्तिकम् अज्विधिः सर्वधातुभ्यः सूत्र से अच् प्रत्यय होता है
['अच्'] प्रत्यय की संज्ञा ['कृत'] भी है
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: अ और ['च'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['2.4.74 यङोऽचि च', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ'], '->', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ']]
धातु का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
---------अभ्यासकार्य----------
['7.4.59 ह्रस्वः', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ'], '->', ['ल', 'उ', 'ल', 'ऊ']]
['7.4.82 गुणो यङ्लुकोः', ['ल', 'उ', 'ल', 'ऊ'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'ऊ']]
---------अभ्यासकार्य समाप्त----------
अच् प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
7.3.84 सार्वधातुकार्धधातुकयोः गुण प्राप्ति
1.1.4 न धातुलोप आर्धधातुके गुण/वृद्धि निषेध
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: उव् और ['ङ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['6.4.77 अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ, 1.1.53 ङिच्च', ['ल', 'ओ', 'ल', 'ऊ'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व']]
अच् प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व'], ['अ']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['प्रातिपदिक']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् के अधिकार में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् विभक्तिप्रत्यय है: स् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['अङ्ग', 'पद - प्रत्यय सहित']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ'], ['स']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['पद - प्रत्यय सहित']
पदस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
पूर्वत्रासिद्धम्
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: र् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['8.2.66 ससजुषो रुँः', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'स'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'र']]
['8.3.15 खरवसानयोर्विसर्जनीयः', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'र'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'ः']]
पदस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
लूय ( लूञ् ) धातु से क्रियासमभिहारे अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन में लोलुवः शब्द बनता है
वैसे तो वस्तुओं को कठंस्थ कर पाने का सामर्थ्य प्रारम्भ से ही बहोत अधिक नहीं था पर गत कुछ वर्षों में तो वो मैंने पूर्णतया खो दिया था। ऐसा होने के मुख्य तीन में से दो कारण थे, १) जब जो चाहिए वो गूगल या हार्ड डिस्क में है ऐसा विश्वास हो जाने से पिछले दो दशक से स्मृति का उपयोग करना बिलकुल छोड दिया था। (जबकि ऐसा करना मूर्खता है यह समझ में आये भी कुछ समय हो गया पर नष्ट हुआ सामर्थ्य पुनः प्राप्त करने के लिये पुरुषार्थ कौन करेगा?) २) मन ने ये दृढ विश्वास कर लिया था की अब मैं कुछ भी कठंस्थ नहीं कर सकती इसका अर्थ यह था की सूत्रपाठ अथवा धातुपाठ तो छोडो, रामः रामौ रामाः भी मेरे बस की बात नहीं थी।
दूसरी अक्षमता यह थी की कुछ हद तक एक बार समझ लेने पर भी वस्तुओं को भूल जाती थी। यह समस्या का निवारण हलाकि पहेली समस्या की भांति असंभव नहीं था। (ठीक है, पर्याप्त पुरुषार्थ करने पर असंभव तो पहेली समस्या का निवारण भी नहीं होगा..). इसके दो समाधान हो सकते थे। मैं अकेले घर बैठे पढने के बदले समूह अध्ययन का हिस्सा बनूं अथवा कोई ऐसे व्यक्ति को पकडूं जिसे मैंने जो पढा है वो पढा सकूं। पर यह दोनों रास्तें बहोत बंधनकारी तथा महेंगे (शक्ति व्यय की दृष्टि से) लगने से मैंने नहीं लिये। तो अब क्या करें?
एक मार्ग था। मैंने कंप्यूटर को पढाने का निश्चय किया। पर एक समस्या और थी। मुझे कोई प्रोग्रामिंग लैंग्वेज नहीं आती थी। पर्याप्त मात्रा में ठोकरें खाने के बाद एक पुस्तक मिली - A byte of python. लेखक शिक्षक की उंगली पकडके सिखना प्रारम्भ किया और पता ही नहीं चला कब वो उंगली छोडके आगे का मार्ग स्वयं (google / stackexchange की दुनिया में) ढूंढना प्रारम्भ हो गया। एक लम्बे लगने वाले प्रयत्न के उपरांत मेरे प्रोग्रामने सर्वप्रथम शब्द 'भागः' बनाया। (output given at the end)
कोई मनुष्य के बदले कंप्यूटर को पढाने का फायदा यह था की वो स्वयं कुछ भी नहीं समझेगा इसलिए जब तक मैं ठीक ठीक समझके ठीक ठीक समझा नहीं पाती, वो सही परिणाम नहीं देगा। पर एक नुकसान भी था। वो ये की जिस उद्देश्य से उसको पढाना प्रारम्भ किया था उसकी पूर्ति होना तो दूर, यह उलटा पड सकता था। (क्योंकि जब एक बार कंप्यूटर को समझा दिया है तो वो सदा याद रखेगा - मुझे याद रखने की क्या आवश्यकता है?)
पर यह एक रसप्रद प्रयोग बना। मेरा पढना पढाना zero knowledge reserve के साथ चल रहा था. यानि,जीतनी बातें अष्टाध्यायीकी आचार्य से सीखी (https://archive.org/details/Ashtadhyayi-Prathamavritti) उतनी का प्रोग्रामिंग कर दिया और उतना प्रोग्राम करने के लिए जीतनी python आनी चाहिए उतनी सिखी। इसका अर्थ यह भी था की जैसे ही मैं अगला पाठ पढती - जो पूर्व सीखी वस्तुओं को विस्तारित करता, मेरा अब तक का सारा काम ध्वस्त हो जाता। मेरा प्रोग्राम सही अर्थमें iterative पद्धति से आगे बढ रहा था। दो तीन महीने बाद एक बहोत ही उत्कृठ तथा उपयोगी साइट http://ashtadhyayi.com/ मिली जिससे सीखना और सरल हुआ। ऐसे ही आगे चलके http://avg-sanskrit.org/sutras/ से भी लाभ मिला।
वैसे यह प्रयास मेरी अनियमितता से अछूता नहीं रहा। बिच बिच में १-२ महीने ध्यान कहीं और भटक जाना स्वाभाविक रहा पर इस बार अवकाश थोडा लंबा ही चला है। ६ महीने हुए ध्यान भटके हुए पर ईश्वर ने चाहा तो कुछ दिनों में इसपे फिर कार्य हो पायेगा। (in a way this post also serves to remind myself to restart working on this front. as of now, I fear I have not only forgot almost all Ashtadhyayi learning as before, but also some of what my program does too.)
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`https://archive.org/details/Ashtadhyayi-Prathamavritti में सर्वप्रथम शब्द 'भागः' बनाया गया है जो इस समय मेरा प्रोग्राम कुछ ऐसे बनाता है।
धातु: भजँ॑_सेवायाम् से ['भाव', 'क्रिया के अपने भाव को कहेने के अर्थ में'] अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन का शब्द बनाना है
['धातु'] के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् धातु है: भज् और ['अँ॑'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
भज् धातु से भाव अर्थ में 3.3.18 सूत्र से घञ् प्रत्यय होता है
['घञ्'] प्रत्यय की संज्ञा ['कृत'] भी है
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: अ और ['घ', 'ञ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
धातु का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
घञ् प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
['7.2.116 अतः उपधायाः', ['भ', 'अ', 'ज'], '->', ['भ', 'आ', 'ज']]
['7.3.52 चजोः कु घिन्ण्यतोः', ['भ', 'आ', 'ज'], '->', ['भ', 'आ', 'ग']]
घञ् प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['भ', 'आ', 'ग'], ['अ']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['प्रातिपदिक']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् के अधिकार में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् विभक्तिप्रत्यय है: स् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['अङ्ग', 'पद - प्रत्यय सहित']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['भ', 'आ', 'ग', 'अ'], ['स']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['पद - प्रत्यय सहित']
पदस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
पूर्वत्रासिद्धम्
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: र् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['8.2.66 ससजुषो रुँः', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'स'], '->', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'र']]
['8.3.15 खरवसानयोर्विसर्जनीयः', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'र'], '->', ['भ', 'आ', 'ग', 'अ', 'ः']]
पदस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
भज् ( भजँ॑ ) धातु से भाव अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन में भागः शब्द बनता है
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लोलुवः शब्द वो ऐसे बनाता है
धातु: लूञ्_छेदने से ['क्रियासमभिहारे', 'क्रिया को बार बार करने के अर्थ में'] अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन का शब्द बनाना है
['धातु'] के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् धातु है: लू और ['ञ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
लू धातु से क्रियासमभिहारे अर्थ में 3.1.22 धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् सूत्र से यङ् प्रत्यय होता है
['यङ्'] प्रत्यय की संज्ञा ['सनादि'] भी है
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: य और ['ङ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
6.1.1 एकाचो द्वे प्रथमस्य ['ल', 'ऊ', 'य']
6.1.4 पूर्वोऽभ्यासः ['ल', 'ऊ', 'य']
6.1.5 उभे अभ्यस्तम् ['ल', 'ऊ', 'य', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ']
6.1.9 सन्यङोः
['6.1.66 लोपो व्योर्वलि', ['ल', 'ऊ', 'य', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ'], '->', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ']]
धातु का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['धातु'] के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
लूय धातु से क्रियासमभिहारे अर्थ में 3.1.34 वार्तिकम् अज्विधिः सर्वधातुभ्यः सूत्र से अच् प्रत्यय होता है
['अच्'] प्रत्यय की संज्ञा ['कृत'] भी है
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: अ और ['च'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['2.4.74 यङोऽचि च', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ', 'य', 'अ'], '->', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ']]
धातु का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
---------अभ्यासकार्य----------
['7.4.59 ह्रस्वः', ['ल', 'ऊ', 'ल', 'ऊ'], '->', ['ल', 'उ', 'ल', 'ऊ']]
['7.4.82 गुणो यङ्लुकोः', ['ल', 'उ', 'ल', 'ऊ'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'ऊ']]
---------अभ्यासकार्य समाप्त----------
अच् प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
7.3.84 सार्वधातुकार्धधातुकयोः गुण प्राप्ति
1.1.4 न धातुलोप आर्धधातुके गुण/वृद्धि निषेध
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: उव् और ['ङ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['6.4.77 अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ, 1.1.53 ङिच्च', ['ल', 'ओ', 'ल', 'ऊ'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व']]
अच् प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व'], ['अ']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['प्रातिपदिक']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् के अधिकार में प्रवेश
इतसंज्ञा होने के पश्चात् विभक्तिप्रत्यय है: स् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['अङ्ग', 'पद - प्रत्यय सहित']
ङ्याप्प्रातिपदिकात् का अधिकार/प्रकरण समाप्त
अङ्गस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य:
सुँ प्रत्यय को मानके अंगकार्य समाप्त होने पर स्थिति है: [['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ'], ['स']]
अङ्गस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
['पद - प्रत्यय सहित']
पदस्य के अधिकार/प्रकरण में प्रवेश
पूर्वत्रासिद्धम्
इतसंज्ञा होने के पश्चात् प्रत्यय है: र् और ['उँ'] वर्णो की इतसंज्ञा हुई है
['8.2.66 ससजुषो रुँः', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'स'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'र']]
['8.3.15 खरवसानयोर्विसर्जनीयः', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'र'], '->', ['ल', 'ओ', 'ल', 'उ', 'व', 'अ', 'ः']]
पदस्य का अधिकार/प्रकरण समाप्त
लूय ( लूञ् ) धातु से क्रियासमभिहारे अर्थ में 1 विभक्ति 1 वचन में लोलुवः शब्द बनता है
